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Tuesday, December 14, 2010

गीली लकड़ी

सियासत की सर्द आँधियों में

एक गर्म सोच से डरते हो???

गर आग तापना है

तो तैयार रहो

काले कडुवे धुंवे को

पीने के लिए

पिछली रात अवांछित लकड़ियों के गट्ठर

बाहर छोड़ दिए थे तुमने

सत्ता में मद में चूर

बेफिक्री से यू ही.....

पिछली रात सर्द थी

सीत भी पड़ी थी रात

आज कमरे में कडुवा धुंवा भर जाए

तो प्रश्न मत करना...

सीत से गीली लकड़ी

नहीं जलती ठीक से

हाँ....यह तुम्हारी कुर्सी ज़रूर सूखी है

जलाकर देखो...

शायद सीत का असर

कुछ कम हो

इसपर....

वर्ना उन अवांछित गीली लकड़ियों की आग

जनतंत्र की स्याही है

याद रखना !!!



(जया पाठक)

Random Thoughts

तुम्हारी दिलचस्पी

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तुम कमरे में आते ही

बत्ती ऑन कर दोगे

मैं अपनी पुरानी ब्लैक-एंड-व्हाइट तसवीरें

समेट लूं

जल्दी से

तुम्हे इनमें ज्यादा दिलचस्पी नहीं

तुम्हे ग्रे के शेड्स पसंद नहीं हैं न...



तुम्हारा चुप होना

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तुम आज बोलते बोलते

चुप हो गए

ज़रूर तुम्हे कुछ सूझा होगा

ज़रूर तुम कुछ कहना चाहते थे

मुझसे आज

तभी आज तुम ज्यादा चुप थे...



इश्क के लिए

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इस शहर की गलियाँ

बहुत तंग - टेढ़ी- मेढ़ी हैं

सडकें बहुत बेलौस सपाट दौड़ती हैं

इमारतें बिना झरोखें

बिना बुनियाद के

एक दूसरे पर टिकी हुयी सी

बंद पड़ी मालूम होती हैं

यह शहर

इश्क के लिए

मुनासिब ठौर नहीं है....



एक रु.

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सिग्नल पर

आज तुम फिर से नन्ही पसरी हथेली पर

चाँद मांग रहे हो...

क्या छोटा सा बेआबरू चाँद यह

अपनी ठंडी चांदनी से

तुम्हारे पेट में गर्मी भर सकेगा....




bharosa

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सबने चेताया था मुझे

उसकी उँगलियों में

गांठें हैं....

सब रेत की तरह

सरक जाया करता है

उसकी मुट्ठी से......

फिर भी मैं अपने सपने उसकी

हथेली में रख आई.

मुझे मालूम है-

उसके मन में गांठें नहीं हैं...

इसलिए वह मेरे सपने सम्हाल लेगा.....




(जया पाठक)

वह कहता है

वह कहता है

ले चुन ले रंग

और अपना रंग लेकर मेरी शक्ल पर

पोत देता है

वह कहता है

ले, अब चुन ले ख़्वाब

और अपने मंसूबे मेरी आँखों पर

टांक देता है

वह कहता है

समाज तेरा है

पर हर कदम पर

लक्ष्मणरेखाएं खींच देता है

चट्टानों पर मेरे लिए

वह कहता है

धर्म तुझे मुक्त करेगा

और आँख नाक कान मुंह पर

पट्टी बाँध देता है

(दलील देता है

सुनो...मंदिर के बंद कपाटों पर भी तो

ताला लगा है)

वह कहता है

अपनी ज़मीन से प्रेम कर

और तेरी अपनी ज़मीन

यहाँ इस रेखा से लेकर

उस सरहद तक है...

इस रेखा के उस पार

वह जो खड़ा है

उस पर गोलियां दाग

वह तेरी स्वायत्तता का दुश्मन है

कहकर मेरे कंधे पर

भारी बन्दूक रख देता है


इसी तरह वह उछालता चलता है

शब्दों के पासे


कहता है -

तू इंसान है

एक मकसद लेकर जी

और मकसद वह खुद बन बैठता है

मैं ताउम्र

उसका मकसद पूरा करने की कोशिश में

अपनी स्वायत्तता को गिरवी रखता जाता हूँ



(जया पाठक)

Wednesday, October 13, 2010

मेरी धूप

वह धूप
भोर में
उतरती है
धीमे से
उसके पैरों में
चांदी की पाजेब
छनकती जाती है
हर ओर....
उसकी चाल के साथ
मेरी कायनात चलती है
छम छम
वह धूप हंसती है
जब पुचकारूं उसे
और जब गले लगा लूं
तो चीख पड़ती है
ख़ुशी के मारे
कभी वह धूप
जवान होगी
तो मेरी पीठ जलाएगी
उसे किसी और के आँगन में रख आना होगा
फिर वह धूप
दिनभर आँगन बुहारते
नए सूरज बोते
उस "किसी और" के आँगन में ढल जाएगी...
मैं देखूंगा
यूँ ढलते उसे
अपनी मुंडेर पर
आस की कोहनी टिकाये
नम आँखों से ....

(जया पाठक)

Friday, August 20, 2010

तुम कवि हो

ढुलमुल चलते लोग...
गतिहीन
जिन्हे चलते हुए रास्ते
पंहुचा ही देते हैं...
कहीं न कहीं
अस्पष्ट लक्ष्य
बेढब सोच
लिजलिजे चरित्र
उजालों के सामने
मींचते आँखें
प्रश्नचिन्हों के सामने
गिड़ गिड़ाते
धर्मों से
माफ़ी मांगते,
रीढ़ विहीन
क्यूँ आखिर
कोशिश कर रहे हो तुम
बेजां
वे नहीं देख पायेंगे
उजियाला तुम्हारा
तुम कवि हो
तुम्हारी कला वही समझे
जो हथेलियों में
लिए फिरता है
समय की धुकधुकी
सीने में रखता है
सच का विवेक
और आँखों में
प्रश्नों का सदाचार
मुश्किल है यूँ चलना
तुम्हारे प्रश्न नहीं हैं
सबके बस के...
लेकिन..
यह दुनिया
ढुलमुल रास्तों पर चलकर तो
नहीं बनी है न....आखिर!

(जया पाठक)

कवि

लो,
लिखी मैंने धूप
लिखी छाँव
लिखा चाँद पर बसा गाँव
सूरज पर पथराव
या रात के सहमे पाँव
लिखी सभ्यता की लहर
धर्मों का कहर
बहता हुआ खून
बेवजह जूनून
सब धोकर बहती नदी
कराहती एक सदी
तरेरती निगाहें
उठती उंगलियाँ
बेबाक प्रश्न
कल आज कल
भीतर बाहर
सच्चा झूठा
सब
उलीच कर लिख डाला
मैंने
अब सोचता हूँ
कविता
तुम्हे लिख पाऊंगा मैं
शायद...

(जया पाठक)

मेरी छत के नीचे

जग बौना है
मन है ऊंचा
मेरी छत के नीचे
सब झूठे हैं
सपने सच्चे
मेरी छत के नीचे


दिन अन्धियाले
रातें उजली
मेरी छत के नीचे
सावन बिन बादल
बिन बिजली
मेरी छत के नीचे

जब तुम आते
धर गिन-गिन पग
मेरी छत के नीचे
तुम संग बनता
सुरभित पग-मग
मेरी छत के नीचे

प्रीत भरा मन
थोड़ी अन-बन
मेरी छत के नीचे
मादक मधु बिन
बौराए मन
मेरी छत के नीचे

विरहाकुल की
कातर चितवन
मेरी छत के नीचे
अभिसार रस
गुपचुप गोपन
मेरी छत के नीचे

सीमित घड़ियाँ
अमित लालसा
मेरी छत के नीचे
लघुतम जीवन
गुरुतम आशा
मेरी छत के नीचे

चन्द शब्द में
व्यापक अंतर
मेरी छत के नीचे
कला सरोवर
कविता निर्झर
मेरी छत के नीचे

इतना कुछ
कैसे सिमटा है
मेरी छत के नीचे
निश्चित कोई
कवि बसता है
मेरी छत के नीचे

(जया पाठक)